गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

वाल्मीकि जयंती : शरद पूर्णिमा

आज शरद पूर्णिमा को वाल्मीकि जी की जयंती पड़ती है। वाल्मीकि मुनि का अवदान क्या है? 
उनके पहले अनुष्टुभ छ्न्द था। ऋग्वेद में ‘श्लोक’ शब्द स्तुति अर्थ में कई बार आया है। पारम्परिक वेदपाठ में वाद्य यंत्रों का निषेध है। वाल्मीकि ने अनुष्टुभ को वीणा गायन से संपृक्त किया। श्लोक स्तुति भर न हो कर ‘शोकजनित’ वह वाच् छ्न्द हुआ जिसने देवत्त्व को जन जन के बीच आदर्श राजत्व के रूप में स्थापित कर आनंदसरि अवगाहन के अवसर भी दिये। 

रामायण के आरम्भ में उनके किसी शिष्य ने जिस प्रसिद्ध श्लोक को जोड़ा, उसके दो रूप कुछ भेद से यूँ मिलते हैं कि एक में जो महिमा नारद जी की है, दूसरे में वही वाल्मीकि जी की हो जाती है: 

तपः स्वाध्याय निरतम् तपस्वी वाग्विदाम् वरम्। 
नारदम् परिपप्रच्छ वाल्मीकिः मुनि पुङ्गवम्॥ 

उन्हें मुनि पुङ्गव कहा गया। उनकी कृति की महानता ही थी जिसने जाने कितने पोंगा पण्डों को जीविका दी। तुलसीदास जी जब ‘दोष रहित दूषण सहित’ लिखे तो जाने उनके मन में क्या था, उससे सम्बंधित श्लोक भी रामायण की कतिपय प्राचीन पाण्डुलिपियों की भूमिका में मिलता है: 

सदूषणापि निर्दोषा सखरापि सुकोमला। 
नमस्तस्मै कृता येन रम्या रामायणी कथा॥ 

रामचरित तो अनूठा है ही, उनकी कथा जन जन का कण्ठहार हुई तो मुनि वाल्मीकि और संत तुलसीदास जैसे पुङ्गवों के कारण। कथा सुनने से भाव वश कण्ठ रुँधें तो होने दीजिये किंतु राक्षस अंतकारी मारुति को न भूलिये। खर, दूषण सहित जाने कितने रावण कलियुग में कथा हरण के ही प्रयास में लगे हैं! 

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। 
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनम् मारुतिम् नमत राक्षसांतकम्॥ 

वाल्मीकि मुनि की जय हो!

रविवार, 17 सितंबर 2017

नीलगाय गाय नहीं, मृग है - घड़रोज

https://en.wikipedia.org/wiki/File:Nilgauantilope_Boselaphus_tragocamelus_Tierpark_Hellabrunn-10.jpg
नीलगाय Boselaphus tragocamelus वस्तुत:  एक मृग है। इसे निलघोड़, घड़रोज आदि नामों से घोड़े से समानता के आधार पर जाना जाता है। कारण, इसकी भागने की गति और आकार। घोड़ों की भाँति ही ये छलाँग और कुलाँच भी ऊँची भरते हैं।
आज भी उत्तर भारत के गाम गिराम मेंं इसके घड़रोज, घोड़पड़ास(भोजपुरी), बनगदहा (मैथिली), रोजड़ा, रोज(राजस्थान), रोझ (बघेलखण्ड, बुंदेलखण्ड), महे नाम पर्याप्त प्रचलित हैं। इन नामों के 'रोज' की संगति संस्कृत 'रुरू' से बैठती है। यह जंतु संस्कृत साहित्य में भी वर्णित है। यथा: 
रुरून् अपेता अपजयान् दृष्ट्वा शोकं प्रहास्यसि।
(वाल्मीकीय रामायण, 3.73.39/1)
रुरू मनुस्मृति के प्रक्षिप्त अंश में भी है- रौरवेण नव एव तु (3.269)। 

इसका एक परवर्ती नाम गोकर्ण, जिसके कान गाय जैसे हों, भी मिलता है। इसके नर नीलाभ होते हैं, आकाश जैसे नहीं, गाढ़ी नीली मसि जैसे।   
https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/c/c8/Nilgai_mating_at_Bandhavgarh_National_Park.jpg
 मुझे पूरी शंका है कि गोकर्ण और नील वर्ण को मिला कर इसे नीलगाय नाम ब्रिटिश लोगों ने दिया। ऐसा 1857 के पश्चात हिन्दू मुस्लिम फाँक को और चौड़ा करने के लिये किया गया होगा। ब्रिटिश काल से पहले इसका नाम किसी स्रोत में नीलगाय मिले तो बताइये। 
कतिपय जन इसे जङ्‍गली गाय भी कहने लगे हैं जोकि ठीक नहींं है। गाय होने की प्राथमिक पहचान है - दूध हेतु पालतू बना पाना या वैसी सम्भावना का होना। घड़रोज में पात्रता होती तो मनुष्य कब का कर चुका होता। 

जङ्‍गली गाय की एक प्रजाति, जिसमें कि ऐसी पात्रता होती थी और जो पालतू बनायी जा सकती थी, अब भारत से लुप्त है किंतु मयान्मार और दक्षिण पूर्व एशिया में मिलती है और पालतू बनायी जा चुकी है।
https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/5/58/Feeding_the_Banteng.jpg
https://en.wikipedia.org/wiki/Banteng#/media/File:Banteng_at_Alas_Purwo.jpg
उसे बर्मा बैंटेंग Burma banteng (B. j. birmanicus) के नाम से जाना जाता है। 

घड़रोज की शस्य को नष्ट करने की प्रवृत्ति और बढ़ती संख्या किसानों के लिये घातक सिद्ध हुई है। कई क्षेत्रों से दलहन और तिलहन की खेती इसके कारण बंद की जा चुकी है। पोषण के लिये  शाकाहारी प्रोटीन दालों में मिलता है जिनका उत्पादन कम होने से मूल्य तो बढ़े ही हैं, लोगों तक पहुँच भी कम हुई है। 


यही स्थिति सरसो की खेती में भी है। रिफाइण्ड और विभिन्न स्रोतों से प्राप्त मिश्रित तेलों के स्थान पर अब विशेषज्ञ सरसो के तेल के प्रयोग को प्रोत्साहित कर रहे हैं जोकि सामान्य जन को सहज ही उपलब्ध हो जाय यदि सरसो की खेती का क्षेत्रफल बढ़ जाय। 

घड़रोज के कारण सरसो की खेती का क्षेत्रफल घटा है और परिणामत: उत्पादन भी। गाय से धार्मिक मान्यता जुड़ी होने के कारण लोग इसे नहीं मारते। लोगों को यह शिक्षित करने की आवश्यकता है कि यह गाय नहीं है। साथ ही घड़रोज की संख्या पर नियंत्रण हेतु इसके वध सम्बन्धित विधिक और नियंत्रक प्रावधानों को सरलीकृत किये जाने की आवश्यकता भी है।     

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

रोहिंग्या मुस्लिम जिहाद, हिंदू और केरल का भविष्य

ARSA (अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना या हरकत अल-यक़ीन या दीनी तबलीग) म्यान्मार सरकार के विरुद्ध लड़ता मुस्लिम जिहादी संगठन है जिसे समस्त विश्व के मुस्लिमों का स्वाभाविक प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन प्राप्त है। 
लगभग 37000 वर्ग किलोमीटर में फैला अराकान प्रांत अब रेखाइन कहलाता है जो कि केरल से कुछ ही छोटा है और केरल की भाँति ही लम्बोतर समुद्र तट इसकी भौगोलिक विशेषता है। 
जैसा कि केरल में भी छिपे रूप में चल रहा है, आतंकवादी संगठन हरकत अल-यक़ीन का उद्देश्य मयान्मार से इस क्षेत्र को काट कर रेखाइन इस्लामी राष्ट्र की स्थापना है।
रोहिंग्या मुसलमान अपने अन्य बिरादरान की तरह ही इस संगठन का प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन करते हैं और इस कारण ही म्यान्मार द्वारा अपनी क्षेत्रीय सम्प्रभुता एवं अखण्डता को अक्षुण्ण रखने हेतु इस आतंकवादी संगठन के विरुद्ध की जा रही कार्यवाही में पिट रहे हैं। इस आतंकवादी संगठन के नेतृत्त्व में रोहिंग्या मुसलमानों ने वहाँ के बौद्ध निवासियों पर भयंकर अमानवीय अत्याचार किये हैं और किये का रहे हैं। 
एक रोचक तथ्य यह है कि नीचतम निर्धनता के चंगुल में फँसे ये मुसलमान अपने बँगलादेशी मजहबियों की भाँति ही हिंदुओं के विरुद्ध जिहाद से नहीं चूकते!
इस्लाम का रुख इन्हें स्पष्ट है और ये मजहबी आदेश का पालन करते हुये वहाँ जो भी थोड़े हिंदू बचे हुये हैं, उनके समूल नाश में लगे हुये हैं अर्थात अपने गले फाँसी लगी है किन्तु तब भी काफिर हिंदुओं के विरुद्ध जिहादी हिंसा में लिप्त हैं।
एक उदाहरण पर्याप्त है। गत 25 अगस्त को सुनियोजित ढंग से घात लगा कर रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यान्मार सेना की सीमा चौकियों और पुलिस पर आक्रमण किया, साथ ही हिंदू गाँवों को भी नहीं छोड़ा। 
रात के अंधेरे में इन मुसलमानों ने रेखाइन प्रांत के मौंग्डा क्षेत्र के गाँवों पर आक्रमण किया और गाँवों को घेर कर वहाँ 86 हिंदुओं की गला रेत कर और चाकू मार कर हत्या कर दी। फकीरा बाजार, रिक्तपुरा और चिकोनछरी गाँवों को आग लगा लगभग 200 परिवारों को गृहहीन कर दिया। अब वे लोग भी बँगलादेश में शरण लिये हुये हैं। 
मुसलमानों और बौद्धों के इस संघर्ष को ले कर भारत के जो कथित प्रगतिशील आतंकी मुसलमानों के लिये न्यायालय से ले कर विश्वविद्यालयों तक प्रदर्शन और समर्थन के भावनात्मक दबाव बनाने में लगे हुये हैं, वे वहाँ के हिंदुओं का नाम तक नहीं लेते! 
यह घटनाक्रम सीख है कि यदि मुस्लिम जिहाद पर नियंत्रण नहीं किया गया तो कल केरल की स्थिति भी काश्मीर और रेखाइन जैसी हो सकती है और यह भी कि वैश्विक मञ्च पर हिंदुओं की पीड़ा को उठाने वाला कोई नहीं है।
क्या भारत सरकार इस दिशा में नेतृत्व करेगी?

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

FREE SEX और सूअरों के साथ मल्लयुद्ध

(मात्र वयस्कों के लिये) 
... 
लेख क्यों?

एक आदरणीय व्यक्ति हैं। फेसबुक पर टैग न करने के अनुरोध पर भी लोग उन्हें टैग कर ही देते हैं। वह निजता विकल्पों का संयोजन ठीक नहीं करते, क्यों? पता नहीं।
एक मृत वामाचारिणी के एक लेख पर द्रवण के पश्चात उसको उचित सिद्ध करते हुये किसी ललगँड़िये ने लिखा और उन्हें टैग किया तो मुझे पता चला। उत्तर वहाँ देना अर्थात उसका प्रचार, इसलिये उत्तर यहाँ दे रहा हूँ। उत्तर नहीं, एक कथ्य भर है, मक्कारी का उत्तर नहीं होता।

... 

वामाचारिणी ने संघियों को यह कहते हुये बलात्कार की उपज बताया था कि उनकी माताओं ने बिना फ्री सेक्स के उन्हें जन्म दिया। 
ललगँड़िये का बचाव यह था कि 'फ्री' शब्द का अर्थ ही संघियों को नहीं पता इसलिये वे मूर्ख हल्ला काटते हुये एक मृतक की छीछालेदर कर रहे हैं।
उसकी मक्कारी स्पष्ट न हुई हो तो आगे हो जायेगी।
... 
बहुधा मैं 15/8/1947 को करियप्पा का अपने सैनिकों से यह कहना उद्धृत करता रहता हूँ कि आज से हम मुफत, तुम मुफत, सारा देश मुफत। Free का अर्थ उन्हें मुफत ही आता था। उन्होंने बहुत ही उत्साह में आत्मीयता जोड़ने के लिये हिंदी न जानते हुये भी मुफत कह कर सबसे अपने को जोड़ लिया था। ... 
... 70 वर्षों के पश्चात ये हरामखोर वामी, जनता को 'फ्री' का शब्दार्थ बता रहे हैं! 
शब्द मक्कारों द्वारा बलत्कृत होने के लिये अभिशप्त होते हैं, वे मक्कार कई रूपों में आ सकते हैं - दिल्ली का ठग, पूर्ण परचून बाजपाई, रबिश, दिग्गी ... कोई भी हो सकते हैं। इस बार एक नया मक्कार मिला है - कबीर नामधारी। 
Free Sex दुधारी तलवार है, इस अर्थ में कि नारा उछालने वाला देशवासियों के नाड़े ढीले कर 'संभोग' की दुहाई देते हुये उन्हें मैथुन कारोबार में लगाने की इच्छा रखता है ताकि उसके जैसों की लिप्सा पूरी होती रहे और इस अर्थ में भी कि एक उन्नत व्यवस्था की जड़ में मट्ठा डाल उसके स्थान पर ह्रासशील व्यवस्था को स्थापित करने की महत्वाकांक्षा भी रखता है। 
बात व्यवहार का द्वैध आरम्भ से ही दिखता है किंतु सेक्स है ही ऐसी चीज कि सबका मन ललचता है सो ध्यान नहीं जाता।
Free Sex में Free का अर्थ उन्मुक्त वर्जनाहीन मैथुन की स्वतंत्रता है। मनुष्य की स्त्री के साथ ऋतु चक्र मासिक है और पुरुष तो सर्वदा रेडी है। प्रकृति में ऐसी व्यवस्था इसलिये विकसित हुई होगी की सर्वश्रेष्ठ फले फूले, खूब उपजे। साथ ही सर्वश्रेष्ठ ने यह समझ भी लिया होगा कि इसका नियमन न किया गया तो फलना फूलना तो दूर, अस्तित्त्व तक के लाले पड़ जायेंगे। ऐसे में ही विवाह, मर्यादायें, विवाह पूर्व संभोग का निषेध आदि आदि विकसित हुये। 
वामी की लिप्सा में ये आड़े आते हैं, उन्हें काटने के लिये शब्द और तर्क तो ढूँढ़ने ही होंगे। Free से अच्छा कोई नहीं। वह उसे दो अर्थों के साथ उछाल देता है - 
भीतर वाला अर्थ वीभत्स और बाहर वाला मधुमय चॉकलेटी। 
दिखाने को कहा जायेगा कि Free का अर्थ consensual है, आपसी सहमति से, Free will से है। विवाह के भीतर भी यदि ये नहीं हैं तो सम्बंध बलात्कार ही है। बहुत लुभावना तर्क है न? 
इस लुभावने तर्क की पैकिंग में धीरे से पूरी विवाह संस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है, उस संस्था को जिसके कारण मानव सभ्यता वर्तमान तक विकसित होती पहुँची है। 
क्यों? 
क्यों कि नियमन वाली काम ऊर्जा सृजन के नये आयाम ढूँढ़ कर मानव को संतुष्टि देती रही, उसे आगे बढ़ाती रही। 
... मृतका के लेख का बचाव करने वाला वह वामुल्ला यदि वस्तुनिष्ठ होता तो उसकी आलोचना में लिखता कि सबके शयन कक्षों में झाँक कर देखा है कि क्या तुम्हारी माँ के अतिरिक्त वे सभी महिलायें अपने पतियों द्वारा बलत्कृत हो रही थीं जिनकी संतानों को तुम ऐसा कह रही हो? 
तुम्हारे पास आँकड़े हैं क्या? 
उन महिलाओं ने बताये हैं क्या कि उनकी सन्तानें बलात्कार की संतानें हैं? 
सनसनी के लिये आप इतना बड़ा आधारहीन जुमला कैसे उछाल सकती हो? यह तो निकृष्टतम घृणा है। 
और तुम्हारी माँ तुम्हारे पिता द्वारा बलत्कृत नहीं हुईं, बलत्कृत होते हुये उसे गर्भ नहीं ठहर गया, इसका प्रमाण? 
इसके स्थान पर वह लोलुप उस लेख की रक्षा में यह तर्क देते हुये थूक रहा है कि लोगों की मानसिकता गंदी है, वे लोग सही अर्थ ले ही नहीं रहे! वह तो विवाह भीतर सहमति के आधार पर संभोग की बात कर रही थी! 
... 
दादा कोंड़के से किसी ने पूछा था कि तुम इतने द्विअर्थी संवाद क्यों लिखते हो? 
उसने पलट कर पूछा कि तुम दूसरा वाला ही क्यों 'पकड़ते' हो, पहला वाला क्यों नहीं? 
... 
वामपंथ के नाम पर कोंड़के छाप गलीज विदूषकों ने हमारे 'स्पेस' पर कब्जा कर लिया है। पुस्तकालय, समाचारपत्र, घर, चाय की दुकान, किटी पार्टियाँ, सिनेमा, टी वी, शिक्षा, सोशल मीडिया, विमर्श ... जो भी हमारे पास थे, वे सब अब उनके पास हैं और हमें पता तक नहीं! 
एक नया रोग दूसरा चल पड़ा है जिसे इधर वाले शास्त्रार्थ कहते हैं और उधर वाले बहस विमर्श। 
अरे! करने किससे हैं? सामने वाला पात्रता भी रखता है? जब मैं KoA, Kick on Ass(embly) कर लतिया देने को कहता हूँ तो मुझे स्पष्ट रहता है कि सामने वाला पात्र नहीं।
उस समय मैं इस लिजलिजी सज्जनता से किञ्चित भी विचलित नहीं होता कि बहस का उत्तर बहस से दो, तर्क रखो, शास्त्रार्थ करो। 
भैया! 
पता तो करो कि उसके मन में क्या है? उद्देश्य क्या है? पात्र है भी या नहीं? उसका एजेण्डा क्या है? 
यूँ ही सूअरों के कीचड़ में लोटने के बुलावे पर दौड़ न जाया करो। 
... 
अगली बार Free Sex पर, इस्लाम की अच्छाइयों पर, मानवाधिकारों पर ... सूअरों से मल्ल में मल मलवाने कब जा रहे हो? समाज सुधार तो तुम्हीं से होना है न! लग लो।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

पोंटहा जरदोह

नाक से बहने वाले स्राव को देसज में पोंटा कहते हैं। कुछ बालक बहुधा इसकी अधिकता से पीड़ित रहते हैं। नाक बहती रहेगी, भगईकच्छा,बण्डीहाथ आदि आदि में पोंछते रहते हैं। कभी कभी तो गाल पर ही पोत देते हैं। ऐसा पोंटा सूख जाने पर भेभन कहलाता है और बहुत फूहड़ लगता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो उसका स्वाद पा लेते हैं। पोंटा बह कर ओठों तक आता है और झट से चट कर जाते हैं। ऐसे बालक पोंटहा कहे जाते हैं।  
जरदोह शब्द बड़ा गहन है। इसका संस्कृत मूल अभी तक नहीं मिल पाया है किंतु अभी के लिये यह मान लेते हैं कि जिद्दी का भोजपुरी रूप हैहालाँकि इसमें वह प्रभाव आ नहीं पा रहा।
कोई बालक यदि पोंटहा हो और जरदोह भी तो समस्या भीषण हो जाती है। ऐसे बालकों का रूदन परायों के लिये मनोरञ्जक और अपनों के लिये दु:ख का कारण होता है। जब रोना आरम्भ करेंगे तो घण्टों बिना आँसू बहाये भी रोते रहेंगे – ऊँ ऊँ ऊँ... आँखें भले सूखी रहेंनाक निरंतर प्रवाहमान रहती है और साथ ही स्थान स्थान पर पोंछने और चाटने की क्रिया भी सहज यांत्रिक भाव में चलती रहती है। बालहठ पकड़ लें तो संकट ही संकट,  कुछ भी कर लोमार पीट लोकोठरी में बंद कर दोघर से निकाल बाहर पथ पर बैठा दोसूखा रूदन चलता रहता है। घर वालों के पास एक ही विकल्प रहता है – छोड़ दोकुछ समय पश्चात जब समझ में आयेगा कि पोंटा चाटने से पेट नहीं भरता तो चुप हो भोजन करने आ जायेगा। यह उपाय सदा सफल होता हो. ऐसा भी नहीं है।
यदि किसी बड़े की टोकारी से पोंटहा जरदोह बालक के मन में रूदन के समय ही कोई धुन उतर आई तो तब तक निस्तार नहीं होता जब तक थक कर सो न जाय। धुन रचना किसी भी प्रकार की हो सकती है यथा ऊँ ऊँ ऊँ ऊ काहे टोकलेंहम त रोवबेहमार गइया बड़ी सुधइया आदि आदि। शब्द कभी कभी बड़े नवोन्मेषी और विचित्र हो जाते हैं।
एक बार ऐसा हुआ कि एक  पोंटहा जरदोह बालक ऐसे ही रो रहा था और उसके बाबा ने डाँट दिया – केतना पिन पिन लगवले बाबड़ा पिनकाह बा रेभागु इहाँ से! उसी समय बालक के ऊपर नवोन्मेष उतरा। उसने अपने बाबा को ही पिनकाह बता कर गायन आरम्भ किया – ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवेंऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें … घर के सभी लोगों को लाज लगने लगी। लोगों ने समझायामाँ ने चपत लगाई लेकिन धुन बंद नहीं हुई। क्रोध में आ कर माँ ने कहा कि आज इसका खाना पानी बंद्!
बाबा ने कहाअरे बहू जाये दलइका हे! बहू ने उत्तर दिया – लइका हे त का भइलकुछहू कहीबिहने चौकी पर हग्गे लागी तब
दिन भर 
ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें गाने के पश्चात बालक थक कर भुँइया ही सो गया। समूचा वदन भेभन पुता था जिस पर मक्खियाँ भनभना रही थीं। उसकी माँ धीरे से उठा भीतर ले गयी।
 बुढ़ऊ बाबा को सीख मिली – पोंटहा जरदोह बालक कुछ नहीं समझताएक बार जो धुन जीभ पर चढ़ गयी तो चढ़ गयी। उसके पश्चात पोंटा चाटते पोतते वह वही करता रहता है जो उसे करना होता है – सूखा गायन। बाबा ने एक और नाम दिया अटकल गरामोफोन - ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवेंऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवेंऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें ...

यदि आप समझते हैं कि अब वैसे बालक नहीं तो भ्रम में हैं। आस पास ढूँढ़ियेकोई न कोई मिल ही जायेगाअवश्य मिलेगा। 

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

पोंटहा जरदोह

नाक से बहने वाले स्राव को देसज में पोंटा कहते हैं। कुछ बालक बहुधा इसकी अधिकता से पीड़ित रहते हैं। नाक बहती रहेगी, भगई, कच्छा, बण्डी, हाथ आदि आदि में पोंछते रहते हैं। कभी कभी तो गाल पर ही पोत देते हैं। ऐसा पोंटा सूख जाने पर भेभन कहलाता है और बहुत फूहड़ लगता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जो उसका स्वाद पा लेते हैं। पोंटा बह कर ओठों तक आता है और झट से चट कर जाते हैं। ऐसे बालक पोंटहा कहे जाते हैं।  
जरदोह शब्द बड़ा गहन है। इसका संस्कृत मूल अभी तक नहीं मिल पाया है किंतु अभी के लिये यह मान लेते हैं कि जिद्दी का भोजपुरी रूप है, हालाँकि इसमें वह प्रभाव आ नहीं पा रहा।
कोई बालक यदि पोंटहा हो और जरदोह भी तो समस्या भीषण हो जाती है। ऐसे बालकों का रूदन परायों के लिये मनोरञ्जक और अपनों के लिये दु:ख का कारण होता है। जब रोना आरम्भ करेंगे तो घण्टों बिना आँसू बहाये भी रोते रहेंगे – ऊँ ऊँ ऊँ... आँखें भले सूखी रहें, नाक निरंतर प्रवाहमान रहती है और साथ ही स्थान स्थान पर पोंछने और चाटने की क्रिया भी सहज यांत्रिक भाव में चलती रहती है। बालहठ पकड़ लें तो संकट ही संकटकुछ भी कर लो, मार पीट लो, कोठरी में बंद कर दो, घर से निकाल बाहर पथ पर बैठा दो, सूखा रूदन चलता रहता है। घर वालों के पास एक ही विकल्प रहता है – छोड़ दो, कुछ समय पश्चात जब समझ में आयेगा कि पोंटा चाटने से पेट नहीं भरता तो चुप हो भोजन करने आ जायेगा। यह उपाय सदा सफल होता हो. ऐसा भी नहीं है।
यदि किसी बड़े की टोकारी से पोंटहा जरदोह बालक के मन में रूदन के समय ही कोई धुन उतर आई तो तब तक निस्तार नहीं होता जब तक थक कर सो न जाय। धुन रचना किसी भी प्रकार की हो सकती है यथा ऊँ ऊँ ऊँ ऊ काहे टोकलें, हम त रोवबे, हमार गइया बड़ी सुधइया आदि आदि। शब्द कभी कभी बड़े नवोन्मेषी और विचित्र हो जाते हैं।
एक बार ऐसा हुआ कि एक  पोंटहा जरदोह बालक ऐसे ही रो रहा था और उसके बाबा ने डाँट दिया – केतना पिन पिन लगवले बा? बड़ा पिनकाह बा रे, भागु इहाँ से! उसी समय बालक के ऊपर नवोन्मेष उतरा। उसने अपने बाबा को ही पिनकाह बता कर गायन आरम्भ किया – ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें, ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें … घर के सभी लोगों को लाज लगने लगी। लोगों ने समझाया, माँ ने चपत लगाई लेकिन धुन बंद नहीं हुई। क्रोध में आ कर माँ ने कहा कि आज इसका खाना पानी बंद्!
बाबा ने कहा, अरे बहू जाये द, लइका हे! बहू ने उत्तर दिया – लइका हे त का भइल? कुछहू कही, बिहने चौकी पर हग्गे लागी तब?
दिन भर
ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें गाने के पश्चात बालक थक कर भुँइया ही सो गया। समूचा वदन भेभन पुता था जिस पर मक्खियाँ भनभना रही थीं। उसकी माँ धीरे से उठा भीतर ले गयी।
 बुढ़ऊ बाबा को सीख मिली – पोंटहा जरदोह बालक कुछ नहीं समझता, एक बार जो धुन जीभ पर चढ़ गयी तो चढ़ गयी। उसके पश्चात पोंटा चाटते पोतते वह वही करता रहता है जो उसे करना होता है – सूखा गायन। बाबा ने एक और नाम दिया अटकल गरामोफोन - ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें, ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें, ऊँ ऊँ ऊँ बाबा पिनकाह हउवें ...

यदि आप समझते हैं कि अब वैसे बालक नहीं तो भ्रम में हैं। आस पास ढूँढ़िये, कोई न कोई मिल ही जायेगा, अवश्य मिलेगा। 

सोमवार, 4 सितंबर 2017

अकाल में शोषण

पुराने साहित्य में लम्बेऽऽऽऽ चले अकाल, दुर्भिक्ष आदि की बातें मिलती हैं। हम भी अकाल काल में रह रहे हैं। इससे पहले कि मैं आगे लिखूँ, स्पष्ट कर दूँ कि हम हैं, यह एक तथ्य ही यह दर्शाने के लिये पर्याप्त है कि चाहे जितने भयानक हों, अकाल हारते रहे हैं। यह अकाल भी हारेगा, आशा बलवती है।
जिस अकाल की बात कर रहा हूँ, पानी, भूमि, पोषण के अकाल के समांतर एक बहुत बड़ा अकाल है नवोन्मेष, दुर्धर्ष कर्मठता, सत्यनिष्ठा और नेतृत्त्व का अकाल। हमने स्वयं कुछ न कर, दूसरों के लिये दायित्त्व निश्चित कर रखें हैं जिनमें सरकारें प्रमुख हैं, वे सरकारें जो हमसे ही निकलती हैं। हम उन ठगों को अपना सरकार बनाते हैं जिन्हें अंग्रेजी में स्ट्रीट स्मार्ट कहा जाता है।
उनके कुकर्मों और काहिली से संत्रस्त हममें जब तब अकाल की अनुभूति एक समूह के स्तर पर सांद्र होती रहती है। उदर में अम्ल, पित्त बढ़ जाते हैं, खट्टी डकारें आने लगती हैं; अपान प्राण को संकट में डालने लगता है और तब कोई एक स्ट्रीट स्मार्ट हमारी मन:स्थिति भाँप कर मसीहा पैगम्बर बन सामने आता है – विनाशाय दुष्कृतां और हम लोट जाते हैं। वह अपने समुदाय के अन्यों से किञ्चित आगे होता है – उसे नारे गढ़ने, उपयुक्त समय पर उछालने और उपयुक्त समय पर ही पुराने को शांतिपूर्वक समय के कूड़ेदान में डाल, दूसरा नया नारा गढ़, उछाल चक्रीय प्रक्रिया बनाये रखने की विद्या आती है।
50 वर्षों के पश्चात लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे, सोच कर हँसेंगे या रोयेंगे, सोच सोच मुझे ग्लानि होती है। अन्ना, दिल्ली का ठग, जाने कितने बाबा बाबी, शाह मोदी ... बहुरुपिये स्ट्रीट स्मार्टों पर हमारे विश्वास न्यौछावर की बड़ी ही लम्बी शृंखला है और उनसे उकता कर मनमोहन जैसी कठपुतलियों को आसनी देने की भी।
ये वे जन हैं जो हमारा अकाल में शोषण करते हैं और प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से बताते रहते हैं – देख ले! हमारा कोई विकल्प नहीं।
उन्हें पता होता है कि शोषित होने के लिये हमारे पास विकल्प ही विकल्प हैं, देश स्ट्रीट स्मार्टों से भरा पड़ा है।
उन्हें चिंता रहती है कि कोई अन्य उनका स्थान न ले ले, इसलिये वे उछलते हुये नये नये नारे उछालते रहते हैं। हमारा ध्वंस ही उनका निर्माण होता है और हम उसे एक दूरगामी शुभ की प्रक्रिया का अंग मान आस लगाये सहते रहते हैं , हमारा शोषण होता रहता है, अकाल जारी रहता है क्योंकि हम अहिंसक स्वेद बहाने को भी संत्रास समझते हैं, रक्त तो धमनियों में बचा ही नहीं!
हम अकाल के वे जाली व्याध हैं जो हिंस्र पशुओं को जाल में फँसादेख निहाल होते हैं और अपनी चबाई जाती हड्डियों की कुड़ुर कुड़ुर को मुक्ति का संगीत बताते एक दूसरे को अहो रूपं अहो ध्वनि की अरण्य किलकारियों से अभिशप्त करते जीतेऔर जीतते हैं।   

हमारे भीतर का अकाल ही हमारे शोषण को पुष्ट करता है, निरंतर उसका आकर्षण बनाये रखता है कि नये नये स्ट्रीट स्मार्ट आते रहें और चक्र चलता रहे। 
हमें आत्ममंथन की आवश्यकता है, आज से उपयुक्त कोई समय नहीं।      

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

भगवद्गीता के पाठ भेद : काश्मीर और शाङ्कर पाठ

भगवद्गीता का काश्मीर पाठ आनंदाश्रमसंस्कृतग्रंथावलि: ग्रंथांक 112 में राजाजानकरामकवि कृत सर्वतोभद्राख्यटीका के साथ प्रकाशित है। इस संस्करण की प्रचलित संस्करण से तुलना करने पर पता चलता है कि पाठभेद बहुत हैं। प्रथम दृष्टया अधिकांश से कोई अंतर पड़ता नहीं दीखता किंतु कुछ अवश्य महत्त्वपूर्ण हैं जो निम्नवत हैं (पहले प्रचलित शाङ्कर पाठ दिया है, तत्पश्चात उसका काश्मीर स्थानापन्न):
विसृज्य ‍~ उत्‍सृज्य
विषीदंत ~ सीदमान क्लैव्यं मा स्म गम: पार्थ ~ मा क्लैव्यं गच्छ कौंतेय
परधर्मो भयावह: ~ परधर्मोदयादपि, योगेश्वर ~ योगीश्वर, शाश्वत धर्म ~ सात्वत धर्म, यक्षासुर ~ गंधर्वयक्षा, योधवीरान्‍ ~ लोकवीरान्‍, अथ चित्तं समाधातुं ~ अथाऽऽवेशयितुं, परित्यागी ~ फलत्यागी, प्रवृद्धे ~ विवृद्धे, उत्क्रामंतं स्थितं ~ तिष्ठंतमुत्क्रामंतं, त्याग: शांति: ~ त्यागोऽसक्ति, धृतिं शौच: ~ धृतिस्तुष्टि, विस्तरश: ~ विस्तरत:, किमन्यत्कामहैतुकं ~ किंचित्कमहेतुकं, अशुभा: ~ अहिता:, दम्भमानमदा ~ दम्भलोभमदा, ज्ञात्वा ~ कृत्वा, यजंते ~ वर्तंते, गणांश्चा ~ पिशाचांश्चा, अचेतस: ~ अचेतनं, हर्षशोका ~ दु:खशोका, मूढ़ग्राहेण ~ मूढ़ग्रहेणा, ब्राह्मणास्तेन ~ ब्रह्मणा तेन, युज्यते ‍ ~ गीयते, न्यासं ~ त्यागं, संप्रकीर्तित: ~ संप्रदर्शित:, यत्‍ ~ य:, पञ्चैतानि ~ पञ्चेमानि, अनपेक्ष्य ~ अनवीक्ष्य, मन्यते ~ बुध्यते, आवृता ~ अन्‍विता, निगच्छति ~ यत्तदात्वे, यत्तदग्रे ~ यत्तदात्वे, तत्सुखं राजसं ~ तद्राजसमिति, दमस्तप: ~ दमस्तथा, ब्रह्मकर्म ~ ब्राह्मं, परिचर्यात्मकं ~ पर्युत्थानात्मकं, काङ्क्षति ~ हृष्यति, मत्पर: ~ भारत, उपाश्रित्य ~ समाश्रित्य, अहंकारान्न श्रोष्यसि ~ अहंकारं न मोक्ष्यसि, शांतिं ~ सिद्धिं, यथेच्छसि ~ यदिच्छसि, विप्रनष्ट: ~ विनष्टस्ते, संस्मृत्य संस्मृत्य ~ संस्मृत्य परमं, त्दृष्यामि च ~ प्रहृष्ये और नीतिर् ~ इति। उपर्युक्त पाठभेदों के अतिरिक्त ऐसे श्लोक भी काश्मीर पाठ में हैं जो शाङ्कर पाठ में नहीं हैं। वे ये हैं:
इसी प्रकार कुछ श्लोक ऐसे भी हैं जो काश्मीर पाठ में नहीं हैं किंतु शाङ्कर पाठ में हैं:
भगवद्गीता पूरे भारत में लोकप्रिय है और मत मतांतर से इसके बहुत से भाष्य भी किये गये हैं।  ऐसे में इन पाठ भेदों और श्लोक आधिक्यों को भौगोलिक भेद के साथ साथ साम्प्रदायिक मान्यताओं के आलोक में सूक्ष्मता से विश्लेषित करना एक महत्त्वपूर्ण शोध कार्य हो सकता है। कोई है जो तुलनात्मक अध्ययन कर सके या कर चुका हो? 

बुधवार, 16 अगस्त 2017

हरिवंश पुराण में रासक्रीड़ा


हरिवंश महभारत का खिल भाग है। आदि पर्व के दूसरे अध्याय मेंं व्यास परम्परा ने हरिवंश के श्लोकों की संख्या 12000 बताई है और दो पर्वों भविष्य एवं हरिवंश का संकेत किया है: 


अब उपलब्ध हरिवंश में तीन पर्व हरिवंश, विष्णु और भविष्य मिलते हैं, श्लोकों की संख्या 16374 तक पहुँच गई है। 
हरिवंश के विष्णु पर्व के बीसवें अध्याय में रासक्रीड़ा का वर्णन है। हरिवंश में राधा नहीं हैं। रास शब्द भी श्लोकों में नहीं आया है बल्कि अध्याय अंत की सूचना में आया है। 
शरच्चंद्र का यौवन देख कर कृष्ण के मन में उसकी चंद्रिका के आवरण में रति आयोजन का विचार आता है। यह वन-गोचारी समाज का यौवनोत्सव है जो ग्राम और नागर नैतिकता के मानकों पर खरा नहीं उतरने वाला। 
रमण आयोजन के पूर्व कृष्ण पुरुष शक्ति प्रदर्शन का आयोजन करते हैं। गोबर के लिये प्रयुक्त भोजपुरिया करसी के तत्सम करीष शब्द द्वारा कवि बताते हैं कि व्रजवीथियाँ गोबर भरी हैं जिनमें बैलों से द्वन्द्व का आयोजन किया गया है। विभिन्न आयोजनों में गोप योद्धा अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं जिनमें पुष्ट बलीवर्द को ग्राह की तरह से पकड़ने का प्रदर्शन भी है - गाश्‍चैव जग्राह ग्राहवद्। तमिळ क्षेत्र में प्रचलित जल्लिकट्टु से मेल खाता है। 
उसके पश्चात रात में युवतियों के साथ गहन वन प्रांतर में रति आयोजन होता है। स्पष्ट है कि यह नवयुवा और युवतियों की केलि है और सम्भव है कि शक्ति प्रदर्शन आयोजनों में जोड़ियों ने एक दूसरे को चुन लिया हो। 
पशुपालकों का आयोजन है, नागर अंगराग आदि का प्रयोग गोपियाँ नहीं करतीं। कवि सूचित करते हैं - करीषपांसुदिग्‍धांगयस्‍ता:। करीष शब्द का पुन: प्रयोग है कि युवतियों की देह में सुगंधादि का लेपन नहीं, गोबर ही पुता है। यह अकुण्ठ उन्मुक्त रतिलीला है, कोई बनाव नहीं, कोई छिपाव नहीं। पति, माता, भाई, किसी की बरज स्वीकार नहीं - वार्यमाणा: पतिभिर्मातृभिर्भ्रातृभिस्‍तथा! 
इस प्रसङ्ग को आराध्य के साथ युत करना एक तरह की परिपक्वता ही कही जायेगी।

कृष्‍णस्‍तु यौवनं दृष्‍ट्वा निशि चन्‍द्रमसो वनम्।
शारदीं च निशां रम्‍यां मनश्‍चक्रे रतिं प्रति।।15।।

स करीषांगरागासु व्रजरथ्‍यासु वीर्यवान्।
वृषाणां जातदर्पाणां युद्धानि समयोजयत्।।16।।

गोपालांश्‍च बलोदग्रान् योधयामास वीर्यवान्।
वने स वीरो गाश्‍चैव जग्राह ग्राहवद् विभु:।।17।।

युवतीर्गोपकन्‍याश्‍च रात्रौ संकाल्‍य कालवित्।
कैशोरकं मानयन् वै सह ताभिर्मुमोद ह।।18।।

तास्‍तस्‍य वदनं कान्‍तं कान्‍ता गोपस्त्रियो निशि।
पिबन्ति नयनाक्षेपैर्गां गतं शशिनं यथा।।19।।

हरितालार्द्रपीतेन स कौशेयेन वाससा।
वसानो भद्रवसनं कृष्‍ण: कान्‍ततरोअभवत्।।20।।

स बद्धांगदनिर्व्‍यूहश्चित्रया वनमालया।
शोभमानो हि गोविन्‍द: शोभयामास तद् व्रजम्।।21।।

नाम दामोदेत्‍येवं गोकन्‍यास्‍तदाब्रुवन्।
विचित्रं चरितं घोषे दृष्‍ट्वा तत् तसय भास्‍वत:।।22।।

तास्‍तं पयोधरोत्‍तुंगैरुरोभि: समपीडयन्।
भ्रामिताक्षैश्‍च वदनैर्निरीक्षन्‍ते वरांगना:।।23।।

ता वार्यमाणा: पतिभिर्मातृभिर्भ्रातृभिस्‍तथा।
कृष्‍णं गोपांगना रात्रौ मृगयन्‍ते रतिप्रिया:।।24।।

तास्‍तु पंक्‍तीकृता: सर्वा रमयन्ति मनोरमम्।
गायन्‍त्‍य: कृष्‍णचरितं द्वन्‍द्वशो गोपकन्‍यका:।।25।।

कृष्‍णलीलानुकारिण्‍य: कृष्‍णप्रणिहितेक्षणा:।
कृष्‍णस्‍य गतिगामिन्‍यस्‍तरुण्‍यस्‍ता वरांगना:।।26।।

वनेषु तालहस्‍ताग्रै: कूजयन्‍त्‍यस्‍तथापरा:।
चेरुर्वै चरितं तस्‍य कृष्‍णस्‍य व्रजयोषित:।।27।।

तास्‍तस्‍य नृत्‍यं गीतं च विलासस्मितवीक्षितम्।
मुदिताश्‍चानुकुर्वन्‍त्‍य: क्रीडन्ति व्रजयोषित:।।28।।

भावनिस्‍पन्‍दमधुरं गायन्‍त्‍यस्‍ता वरांगना:।
व्रजं गता: सुखं चेरुर्दामोदरपरायणा:।।29।।

करीषपांसुदिग्‍धांगयस्‍ता: कृष्‍णमनुवव्रिरे।
रमयन्‍त्‍यो यथा नागं सम्‍प्रमत्‍तं करेणव:।।30।।

तमन्‍या भावविकचैर्नेत्रै: प्रहसितानना:।
पिबन्‍त्‍यतृप्‍तवनिता: कृष्‍णं कृष्‍णमृगेक्षणा:।।31।।

मुखमस्‍याब्‍जसंकाशं तृषिता गोपकन्‍यका:।
रत्‍यन्‍तरगता रात्रौ पिबन्ति रसलालसा:।।32।।

हा हेति कुर्वतस्‍तस्‍य प्रह्रष्‍टास्‍ता वरांगना:।
जगृहुर्निस्‍सृतां वाणीं नाम्‍ना दामोदरेरिताम्।।33।।

तासां ग्रथितसीमन्‍ता रतिं नीत्‍वाआकुलीकृता:।
चारु विस्‍त्रंसिरे केशा: कुचाग्रे गोपयोषिताम्।।34।।

एवं स कृष्‍णो गोपीनां चकवालैरलंकृत:।
शारदीषु सचन्‍द्रासु निशासु मुमुदे सुखी।।35।।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

सावन में सन्न्यासी



सरस तीर सन्न्यासी बैठा था। पीले, धूसर और किञ्चित हरे मण्डूक मेंक माँक, मेंक माँक ... कर रहे थे। उनके फूलते पिचकते कपोलों के अनुकरण में जैसे जल में भी बुलबुले उठ रहे थे। बुलबुले उठते, आकार ले कुछ पल प्लवित रहते और फूट जाते। सन्न्यासी की देह फुहार जैसा अनुभव करती, वर्षा होगी, होगी ...
... पर्जन्य अनुग्रही हुआ। सावन की झमाझूम वर्षा आरम्भ हो गयी। मण्डूक चुप हो गये, बुलबुले जाने कहाँ गये, प्राणी जगत का स्वर रहा ही नहीं, मात्र पर्जन्य की हहर थी।
सन्न्यासी बैठा सुनता रहा, सुनता रहा, सुनता रहा। तृप्त हुआ और अनुरोध कर बैठा - अब थम भी जाओ। चमत्कार हुआ, सब थम गया। पल भर, बस उस पल में जब कि सब थम गया था, नीरवता थी, सन्न्यासी ने गहन गुहा से आह्वान सुना और चल पड़ा।
प्रस्थान स्वस्ति में पार्श्व गायन पुन: आरम्भ हो गया - मेंपों, मेंपों, मेंपों ... स्वर भिन्न थे।
सन्न्यासी के ओठ स्मित आ विराजी - ये मण्डूक भी न... कितने विलासी होते हैं, गायन निपुण भी। गंधर्वों जैसे, बंदी जैसे, सूत मागध जैसे ... संसर्ग अवसर मिल जाय तो चुप हो जाते हैं।
दूर गगन की घटा ने उसकी सोच में हाँ में हाँ मिलाई ... आ जाओ न!
उसने मस्तक ऊपर कर सम्मान दिया और साँसें सावित्री हो गयीं -
अ आ उ ऊ .ँ उ उँ ऊँ हँ .ँ उ ऊ ऊ उ म अ उ म आ उ म ओ .ँ ओं ओँ आ उ म तत् तत्‍ स स स स व इ ई ई वई त तु तू र र इ ई ईई व व र रण ए ए हे ई ई इ ण इ ई य य यं य य आ ऊँ तत् तत्‍ स स स स व इ ई ई वई ई म ह ही हीं हीँ ओँ ओं ओ आ अ अ अ: ह : : .ँ ,,,
,,, कहते हैं कि वह स्वरों में खो गया, उसका कुछ अता पता नहीं चला। 
 

सोमवार, 24 जुलाई 2017

भागवत पुराण स्फुट - 2 [अध्याय 3.20, स्वयंभू द्वारा सृष्टि], तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्

पिछले अंक से आगे ...

सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये ।
लोकसंस्थां यथा पूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ ०३.२०.०१७ ॥
ससर्ज च्छाययाविद्यां पञ्चपर्वाणमग्रतः ।
तामिस्रमन्धतामिस्रं तमो मोहो महातमः ॥ ०३.२०.०१८ ॥
विससर्जात्मनः कायं नाभिनन्दंस्तमोमयम् ।
जगृहुर्यक्षरक्षांसि रात्रिं क्षुत्तृट्समुद्भवाम् ॥ ०३.२०.०१९ ॥
क्षुत्तृड्भ्यामुपसृष्टास्ते तं जग्धुमभिदुद्रुवुः ।
मा रक्षतैनं जक्षध्वमित्यूचुः क्षुत्तृडर्दिताः ॥ ०३.२०.०२० ॥
देवस्तानाह संविग्नो मा मां जक्षत रक्षत ।
अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं बभूविथ ॥ ०३.२०.०२१ ॥
...
स्वयं से उत्पन्न स्वयंभू में भगवान आविष्ट हुये और उनके ऐसा करने पर सृष्टि का निर्माण आरम्भ हुआ। भागवत कार 'भगवता' शब्द का प्रयोग करते हैं जोकि बौद्ध परम्परा में भी खूब प्रयुक्त हुआ है। लिखते हैं - यथा पूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया, पूर्वकाल में स्वयं द्वारा संस्थाओं के अनुकरण में (पुन:) लोकसंस्था (सृष्टि) रचने लगे।
सृष्टि के चक्रीय क्रम को पूर्व शब्द द्वारा संकेतित किया गया है। 'संस्था' और 'लोकसंस्था' शब्द प्रयोगों पर ध्यान दीजिये कि अर्थ कितने परिवर्तित हो गये हैं!
यदि आप संस्कृत मूल नहीं पढ़ेंगे तो शब्दों की इस यात्रा से अपरिचित रह जायेंगे और अंतत: म्लेच्छ प्रतिपादित रूढ़ अर्थों के दास बन कर रह जायेंगे। इसलिये [संस्कृत पढ़िये]।
...
आगे जो हुआ उसे पढ़ते ही ऋग्वेद का नासदीय सूक्त मन में उठने लगता है:
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥
तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥
...
स्वयंभू ने अपनी छाया से पाँच अविद्यायें उत्पन्न कीं - तामिस्र, अंधतामिस्र, तम, मोह और महामोह - तम आसीत्तमसा ... जैसे भागवतकार नासदीय का भाष्य कर रहे हों!
उन्हें अपनी ऐसी तमोमय काया अभिनन्दनीय नहीं लगी तो उसका विसर्जन कर दिये। वह काया क्षुधा और प्यास रूपी रात हुई जिसे उसी से उत्पन्न यक्षों और राक्षसों ने अपना लिया - रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः!
भूख और प्यास से व्याकुल वे दोनों उन्हें खाने दौड़े। कुछ कह रहे थे कि इसे खा जाओ, तो कुछ - इसकी रक्षा मत करो।
उद्विग्न देव ने उनसे कहा कि तुम सब मेरी प्रजा हो, मुझे न खाओ, मेरी रक्षा करो। (जिन्होंने कहा कि रक्षा न करो, वे राक्षस कहलाये और जिन्होंने कहा कि खा जाओ वे यक्ष कहलाये।)
...
भाष्यकारों द्वारा लगाया गया अर्थ राक्षसों के लिये प्रचलित उपपत्ति 'वयं रक्षाम:' से मेल नहीं खाता। अस्तु।
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किसी नये महत कार्य हेतु मंथन में पहले तम और अवांछित ही सामने आते हैं जिन्हें विघ्न कह लीजिये, हलाहल विष कह लीजिये या राक्षस और यक्ष; उनसे पार पाने पर ही अमृत है।
...
आगे स्वयंभू ने देवताओं के सृजन के पश्चात अदेव (असुरों) की सृष्टि की जो कामवश उनसे ही मैथुन करने को तत्पर हो उन्हें दौड़ा लिये।
घबराये स्वयंभू हरि की शरण में गये और उनकी बात मान कर तन छोड़ दिये जोकि अतीव सुंदरी में परिवर्तित हो गया।
भागवतकार उस सौंदर्य की प्रशंसा में जैसे सामुद्रिक शास्त्र उठा लेते हैं:
...
तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम् ।
काञ्चीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ॥ ०३.२०.०२९ ॥
अन्योन्यश्लेषयोत्तुङ्ग निरन्तरपयोधराम् ।
सुनासां सुद्विजां स्निग्ध हासलीलावलोकनाम् ॥ ०३.२०.०३० ॥
गूहन्तीं व्रीडयात्मानं नीलालकवरूथिनीम् ।
उपलभ्यासुरा धर्म सर्वे सम्मुमुहुः स्त्रियम् ॥ ०३.२०.०३१ ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः ।
मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति ॥ ०३.२०.०३२ ॥
वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम् ।
अभिसम्भाव्य विश्रम्भात्पर्यपृच्छन् कुमेधसः ॥ ०३.२०.०३३ ॥
कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेऽत्र भामिनि ।
रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्नो विबाधसे ॥ ०३.२०.०३४ ॥
या वा काचित्त्वमबले दिष्ट्या सन्दर्शनं तव ।
उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मनः ॥ ०३.२०.०३५ ॥
नैकत्र ते जयति शालिनि पादपद्मं घ्नन्त्या मुहुः करतलेन पतत्पतङ्गम् ।
मध्यं विषीदति बृहत्स्तनभारभीतं शान्तेव दृष्टिरमला सुशिखासमूहः ॥ ०३.२०.०३६ ॥*
इति सायन्तनीं सन्ध्यामसुराः प्रमदायतीम् ।
प्रलोभयन्तीं जगृहुर्मत्वा मूढधियः स्त्रियम् ॥ ०३.२०.०३७ ॥
...
आप में से कितनों ने उषा सूक्त पढ़ा है? ऋग्वेद का वह सूक्त अपने अद्भुत सौंदर्य के लिये जगविख्यात है। यहाँ संक्रमण में ब्रह्मा की देह पहले रात होती है और आगे परम रूपवती संध्या। वैदिक प्रभाव स्पष्ट है।
उस संध्या के सौंदर्य से मूढधिय (गधे के समान बुद्धि वाले) असुर इतने मुग्ध हुये कि उसे स्त्री समझ ग्रहण किये।
सौंदर्य सौंदर्य में अंतर होता है, जो भेद नहीं जानते वे असुरों के समान ही मूढ़ होते हैं।

आगे स्वयंभू ने बारम्बार देह धारण और त्याग कर, भिन्न भिन्न भूतों की सृष्टि की।
...

स किन्नरान् किम्पुरुषान् प्रत्यात्म्येनासृजत्प्रभुः ।
मानयन्नात्मनात्मानमात्माभासं विलोकयन् ॥ ०३.२०.०४५ ॥
ते तु तज्जगृहू रूपं त्यक्तं यत्परमेष्ठिना ।
मिथुनीभूय गायन्तस्तमेवोषसि कर्मभिः ॥ ०३.२०.०४६ ॥
पानी में अपनी छवि देख मुग्ध हुये स्वयंभू ने स्वयं से ही किम्पुरुष और किन्नरों की उत्पत्ति की जो उषाकाल में दम्पतिरूप ले उनका स्तुतिगान करते हैं।
...
स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः ।
तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ०३.२०.०४९ ॥

मनुष्यों की सृष्टि कब की?
संतुष्ट स्थिति में स्वयं को कृतकृत्य मानते हुये अपने मन से 'लोककल्याणकारी' मनुओं (मनुष्यों) की सृष्टि की।
मनुष्य के ऊपर समस्त प्राणियों के कल्याण का दायित्त्व है।
...
मनुष्य को आदर्श भी तो चाहिये।
तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना ।
ऋषीनृषिर्हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ०३.२०.०५२ ॥
तेभ्यश्चैकैकशः स्वस्य देहस्यांशमदादजः ।
यत्तत्समाधियोगर्द्धि तपोविद्याविरक्तिमत् ॥ ०३.२०.०५३ ॥

स्वयंभू ने तप, विद्या, योग, सुसमाधि से युक्त होकर अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में कर ऋषियों की सृष्टि की और उनमें से हर एक को अपनी अब तक बारम्बार रूप ले सृजन और स्वयं का विसर्जन करती उस देह के अंश सौंप दिये जो समाधि, योग, ऋद्धि, तप, विद्या और विरक्ति को धारण किये हुये थी। काय प्रयोग न कर देह शब्द का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है जोकि विस्तार से सम्बंधित है।
...
सृष्टि के क्रम में हम देखते हैं कि स्वयंभू क्रमश: तम, रज और सत भाव में संक्रमित होते अंतत: मनुष्य और उसके आदर्श ऋषियों की रचना कर काया से मुक्त हो जाते हैं।
इस कथा में मनुष्य और उसके आदर्शों की श्रेष्ठता तो स्पष्ट है ही, अन्य प्राणियों के प्रति उसके दायित्त्व भी संकेतित हैं।
~ तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ~
॥हरि ॐ॥